Monday, March 21, 2011

! ख्वाहिशों की भीड़ में कहीं ज़िन्दगी खोती रही !

साँस जाने बोझ कैसे जीवन का ढोती रही,

नयन बिन अश्रु रहे पर ज़िन्दगी रोती रही,

एक नाज़ुक ख्वाब का अंजाम कुछ ऐसा हुआ,

मैं तड़पता रहा इधर वो उस तरफ़ रोती रही,

भूख,आंसू और गम ने उम्र तक पीछा किया,

मेहनत के रुख पर ज़र्दियाँ,तन पर फटी धोती रही,

उस महल के बिस्तरे पे सोते रहे कुत्ते,बिल्लियाँ,

धूप में पिछवाडे एक बच्ची छोटी सोती रही,

तंग आकर मुफलिसी मन खुदखुशी कर की मगर,

दो गज कफ़न को लाश उसकी बाट जोती रही,

'तरुण' की ख्वाहिशों का कद इतना बढ गया,

ख्वाहिशों की भीड़ में कहीं ज़िन्दगी खोती रही......!!!!!

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