किताबों में मेरे फ़साने धुंडते हैं,
नादान हैं गुज़रे ज़माने धुंडते हैं,जब वो थे तलाश-ए-जिंदगी भी थी,
अब तो मौत के ठिकाने ढूंढते हैं,कल खुद ही अपनी महफ़िल से निकला था,
आज हुए से दीवाने धुंडते हैं,मुसाफिर बेखबर हैं तेरी आँखों से,
तेरे शहर में मयखाने धुंडते हैं,तुझे क्या पता ए-सितम धाने वाले,
तेरे दिए ज़ख्मों में प्यार के नजराने धुंडते हैं,निकल आते हैं अश्क हँसते हँसते,
हम तो रोने के बहाने धुंडते हैं......!!!!!!!!!
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